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Dr. APJ Abdul Kalam

_20180815_201510आज बनावटी सरदर्द का बहाना बना के घर जरा जल्दी आ गया। रेडिओ ऑन किया तब उसपे कलाम साहब का रिकॉर्डेड इंटरव्यू चल रहा था। चूँकि लेट हुआ था तो आशय न जान सका बजाय उसके मौजे निकालते निकालते इंटरव्यू सुनने लगा।

कलाम साहब, एक ऐसी शख्सियत है जिसे किसी प्रस्तुतीकरण की जरुरत नहीं। डॉ. ए पी. जे. अब्दुल कलाम, मिसाइल मैन, जो भारत के पहले उपग्रह प्रक्षेपण यान के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रेह चुके है, जिनकी बदौलत भारत में मिसाइल क्रांति आयी, जिन्होंने १९९८ के पोखरण परमाणु बम टेस्ट कराई, जो की भारत के अत्यंत लाडले राष्ट्रपति रेह चुके है, वो आज खुद हमारे खास धारावाहिक गुफ्तगू में आये है।

कलाम न की सिर्फ एक अच्छे राष्ट्रपति थे, की एक अच्छे वैज्ञानिक है, न की एक भक्कम लीडर है बल्कि एक हसीन व्यक्तित्व भी रहे है। १९९० के गणतंत्र दिन पर देश ने मिसाइल की कामयाबी का जल्लोष मचाया। कलाम साहब को पद्मभूषण मिला। लेकिन सर के साथ १० बाय १२ का कमरा, कुछ किराये का फर्नीचर और किताबो का वही ढेर था। फर्क इतना ही था तब वो कमरा त्रिवेन्दम में था और बाद में हैदराबाद में। जब वे राष्ट्रपति थे तब उन्होंने दीवारों पे काच के टुकड़े लगाने को ना कह दिया था की कोई चिड़िया या पंछी को उससे हानि न हो। जब वे राष्ट्रपति थे तब उनके परिवार के ४२ लोग राष्ट्रपति भवन आये थे तब उसका कोई भी आर्थिक भार कलाम सर ने भारतीयों की जेब पे आने नहीं दिया बल्कि खुद ही ३ लाख २० हज़ार सचिव को दे दिए। एक बार सर जब IT BHU गए थे तब औरो से खुदकी कुर्सी आलिशान पाकर उसको बदलने की मांग की थी। यह सब किस्से आप जानते ही होंगे। कलाम साहब जब DRDO में प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे तब उनकी टीम को अपना सर्वस्व मानते थे। उन्होंने पोलियो पीड़ितों का दर्द समज़ते हुए उनके लिए कुछ नयी खोज करने का सुझाव वैज्ञानिको को दिया।

 

आज हम बात करने वाले है ऐसी ही कुछ निजी चीज़ों पे। सर्वप्रथम नमस्कार कलाम सर! सर उस टापू का नाम कैसे कलाम टापू पड़ा?”

शायद वह वक़्त जुलाई १९९५ का था जब हमारी पृथ्वी मिसाइल की चौथी उड़ान कामयाब हुयी थी ।लगभग १५०० लोगो की तामील रंग लायी थी। लेकिन उस दौर में उतने तक रुक जाना हमारी टीम को ना-मक़बूल था। तब तत्कालीन लेफ्नेंट जनरल रमेश खोसला जी ने हमें CEP ( Circular Error Probability) नामक टेक्नोलॉजी की खोज करने को कहा की जिस बदौलत वे १५० मीटर्स तककी गतिविधियों पे नज़र रख सखे। जब हम लोगो ने नक्शा खोला तब हम ने पाया की एक जगह तक़रीबन ७०-८० किलोमीटर्स तक की जमीं पे सिर्फ ५ डॉट्स थे जिससे कुछ नतीजा निकालना मुश्किल था। रात के २ बजे तब हमने व्हीलर आयलैंड जाने का फैसला किया। एक हेलीकाप्टर के सर्वेक्षण से कुछ जानकारी पता नहीं चल रही थी। फिर हमने स्थानिक मछुवारो से बात की| उनसे बोट लेके हम रात के अँधेरे में निकल पड़े। साथी ने कुछ फल लाये थे जो की हमरे भोजन का साधन बन गए। आज भी याद है रात की परिस्थितिया बड़ी कठिन थी । मटरगश्ति करने की फुर्सत नहीं थी हलाकि चाहत बिलकुल थी। (हँसते हुए) खुला आसमान खतरे की चेतावनी दे रहा था या साहस को न्योता। रात जैसे तैसे हमने गुज़ार दी, फिर सवेरे हम काम करने लग गए। उस ३ किमी लम्बे और ८०० मि चौड़े टापू पे आश्चर्य की बात यह थी की वहां बांग्लादेशी झंडा लहरा रहा था। मेरे साथ आये मित्र ने वह झंडा निकला और हमने वापस आते ही सरकार को उस टापू के बारे में सूचित क़र दिया और ओडिशा सरकार मान भी गए। अब DRDO को अपना हक की जगह मिल गयी थी काम करने।

 

कलाम साहब बच्चो से आपका बहोत लगाव है, यह तोह हम सब जानते है हालखी मार्च २०१२ के अन्ना यूनिवर्सिटी में पूछे गए एक छात्र के सवाल को मैं दोहराना चाहता हूँ। अमर्त्य सेन, जो की खुद नोबेल प्राप्त इंसान है और जो भारत में हुए विकास की प्रशंसा का करते है लेकिन उन्होंने मई १९९८ के पोखरण को भद्दा करार दिया था, उसकी निंदा करी थी। आप उस बारे में क्या विचारधारा रखते है?”

 

मैं डॉ. अमर्त्य सेन की प्रशंसा करता हूँ और उन्होंने अर्थशास्त्र में दिए योगदान का सम्मान करता हूँ। उनके सुलझावो का भी आदर करता हूँ जैसे की प्राथमिक शिक्षा अच्छे तरीके से प्रदान की जाये। परन्तु वे इस घटना को पश्चिमी दृष्टिकोण से देखते है। उनके अनुसार भारत ने सभी मुल्को के साथ सलोखे से, दोस्तीपूर्ण स्वाभाव से सम्बन्ध रखने चाहिए जो की एक अर्थशास्री के अनुसार उचित है परन्तु डॉ. जवाहरलाल नेहरू जी ने जो परमाणु प्रसार के खिलाफ जब भारत का पक्ष रखा था तब तकरीबन तकरीबन १०,००० परमाणु मुखास्त्र अमरीका के पास थे और उतने ही रशिया के पास। जब की यूके, चीन, पाकिस्तान, फ्रांस जैसे मुल्को के पास अपने अपने परमाणु हतियार थे, START II अग्रीमेंट में कोई भी अपने मुखस्त्रो को २,००० के निचे नहीं लाना चाहता था। हमारे बगल के दोनों मुल्को के पास परमाणु हथियार थे। तोह क्या उन युद्धजन्य परिस्थितिओ में भारत सिर्फ मूक दर्शक बन कर रहता?”

 

कलाम साहब अध्यात्म जीवन और सायन्स को कैसे रिलेट करते है? और मातृभाषा का महत्त्व क्या है?”

हमारा (भारतीयों) का आध्यात्मिक ज्ञान हमारी ताकद है और रहा है। हमने अन्वेषकों के आक्रमण से हमेशा अपने आप को उभरा है। हमने सोसायटी में आने वाले बदलाओं को सहा है। परन्तु इन समायोजनों में हमने हमारे लक्ष्य और महत्वाकांक्षाओं को कम कर लिया। हमे सायन्स और टेक्नोलॉजी और विरासत को देखने का नजरिया बड़ा करना होगा। टेक्नोलॉजी की फील्ड में आगे जाना अध्यात्म के बंद करने से नहीं होगा। हमे तरक्की का खुद का मार्ग बनाना होगा। विरासती ज्ञान और नए नजरिये का संकल्प लिए स्वप्नों को सजाना होगा। इंग्लिश बहुत आवश्यक है मौजूदा समय क्यों की विज्ञान सम्बन्धी मूल ज्ञान इंग्लिश में है। पर मुझे विश्वास है की कुछ सालो बाद हमारी भाषाओ में विज्ञान का मूल ज्ञान होगा और उस वक़्त हम भी जापान की तरह परिवर्तित होके तरक्की कर सकेंगे।

 

वैसे तोह कलाम साहब के साथ बातचीत करने के लिए शब्द अधूरे पद जाये, लेकिन अब ७ बज चले है, यह कार्यक्रम जारी रहेगा अगले दिन भी। जाने से पहले प्रस्तुत है कलाम साहब की हिंदी में अनुवादित कुछ पंक्तिया

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और रेडिओ बंद हो गया। आज मैंने कलाम सर के व्यक्तिमत्व का एक नया पहलु समझा था। वे एक देशप्रेमी थे, जो खुद के मृत्यु के पश्चात उन्हें सरकारी कलेण्डर की छुट्टियों में नहीं बल्कि काम में खोजने की सलाह देते थे। कलाम एक ऐसी शख्सियत थी जिन्होंने अपनी रिटायरमेंट के बाद खुद को गरीब बच्चो के प्रति समर्पित किया। उन्होंने खुद किये गलतियों से लिए सबक को तजुर्बे में परिवर्तित किया और हम सब में एक धारणा(फिलोसोफी) की तरह समा गए।

 

किसी ने क्या खूब कहा है,

 

चाहे लहू, पसीने या पानी से हो

यह आग जलती रहनी चाहिए

मेरे सीने में न सही, तेरे सीने सही

इन रूहों में कलामियत बसनी चाहिए ।

हर्षवर्धन

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